cg board assignment 2021 class 12 biology November | cg board assignment-4 class 12th biology

      

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 छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मण्डल, रायपुर

           शैक्षणिक सत्र 2021-22 माह नवम्बर

                     असाइनमेंट – 04

  

                     कक्षा -बारहवीं

                     विषय–जीवविज्ञान

निर्देश :- दिए गए सभी प्रश्नों को निर्देशानुसार हल कीजिए।

प्रश्न 1. संक्षेप में बताइये. अंक 3 शब्दसीमा 50-75

(1) PCR

(2) प्रतिबंधन एन्जाइम व DNA

(3) काइटिनेज

उत्तर :— 1) PCR : कैरी मुलिस द्वारा पीसीआर का उपयोग 1983 में किया गया। इसलिए उनको 1993 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

पोलीमरेज श्रृंखला अभिक्रिया (Polymerase Chain Reaction) एक पात्रे डीएनए प्रवर्धन तकनीक ( In-vitro DNA amplification technique) है, जिसके द्वारा किसी जीन या वांछित डीएनए की लाखों प्रतियों को कुछ ही समय में संश्लेषित (Synthesis) किया जा सकता है। इसमें विशिष्ट डीएनए पोलीमरेज़ एंजाइम (जिसे टैक पॉलीमेरेज़ कहा जाता है) का इस्तेमाल किया जाता है।

2) प्रतिबंधन एन्जाइम व DNA : प्रतिबंध एंडोन्यूक्लिज़ एंजाइम का एक वर्ग है जो डीएनए अणुओं को काटता है। प्रत्येक एंजाइम डीएनए किनारा में न्यूक्लियोटाइड के एक अद्वितीय अनुक्रम को पहचानता है। इस तरह की अनुक्रम आम तौर पर लगभग 4 से 6 आधार-जोड़े लंबे होते हैं। यह अनुक्रम पुलिंदामाइक है जिसमें मानार्थ डीएनए किनारा का रिवर्स दिशा में ही अनुक्रम होता है।

दूसरे शब्दों में, डीएनए की दोनों किस्में एक ही स्थान पर काट ली जाती हैं।

2)DNA :— डी एन ए जीवित कोशिकाओं के गुणसूत्रों में पाए जाने वाले तंतुनुमा अणु को डी-ऑक्सीराइबोन्यूक्लिक अम्ल या डी एन ए कहते हैं। इसमें अनुवांशिक कूट निबद्ध रहता है। डी एन ए अणु की संरचना घुमावदार सीढ़ी की तरह होती है। डीएनए का एक अणु चार अलग-अलग वस्तुओं से बना है जिन्हें न्यूक्लियोटाइड कहते है।

प्रश्न 2 क्लोनिंग के लिये ई. कोलाई जीवाणु को उपयुक्त परपोषी माना जाता है क्यों? अंक 3 शब्दसीमा 50-75

उत्तर :— क्लोनिंग के लिए ई. कोलाई जीवाणु को उपयुक्त परपोषी निम्न गुणों के कारण माना जाता हैं –

(i) यह आसानी से रुपान्तरित हो जाता हैं ।

(ii) (ii) इसमें कार्यशील सीमाकारी एन्जाइम्स का अभाव होता हैं ।

(iii) यह पुनर्योगज डी.एन.ए. की पुनरावृत्ति में सहायता करता हैं । (iv) इसके डी.एन.ए. की सरंचना व अन्य जैव रासायनिक क्रियाए पूर्णतः ज्ञात हैं ।

 (v) इसके प्लाज्मिड व जीवाणुभोजियों को स्पष्ट रुप से अभिलक्षित किया जा चुका हैं ।

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प्रश्न 3.कारण बताओं अंक 3 शब्दसीमा 50-75
(1) बाजार से खरीदा बोतल वाला फल का रस घर में बने रस की तुलना में अधिक साफ व स्वच्छ होता है।
(2) स्विस चीज में बड़े-बड़े छिद्र का पाया जाना ।

उतर :—

 1) ऐसा इसलिए है क्योंकि बोतलबंद रस एंजाइम पेक्टिनेज और प्रोटीज के उपयोग से स्पष्ट हो जाते हैं।

2) ‘स्विस चीज़’ में बड़े छेद प्रोपियोनिबैक्टीरियम शार्नमनी( Propionibacterium sharnmani ) नामक जीवाणु द्वारा बड़ी मात्रा में CO2 के उत्पादन के कारण होते हैं।

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प्रश्न 4. जैव ऊर्वरक किसे कहते है? उदाहरण सहित समझाईये। अंक 3 शब्दसीमा 50-75

उत्तर :—

वास्तव में जैव उर्वरक विशेष सूक्ष्मजीवों एवं किसी नमी धारक पदार्थ के मिश्रण हैं। विशेष सूक्ष्म जीवों की निर्धारित मात्रा को किसी नमी धारक धूलीय पदार्थ (चारकोल, लिग्नाइट आदि) में मिलाकर जैव उर्वरक तैयार किये जाते हैं। यह प्रायः ‘कल्चर’ के नाम से बाजार में उपलब्ध है। वास्तव में जैव उर्वरक एक प्राकृतिक उत्पाद है।

Eg. माइक्रोफॉस जैव उर्वरक (Microfoss bio fertilizer)

एजोटोबैक्टर जैव उर्वरक (Azotobacter Bio Fertilizer)

राइजोबियम जैव उर्वरक (Rhizobium bio fertilizer)

प्रश्न 5.हम किस प्रकार कह सकते है कि जीवाणु हमारे मित्र है। अंक-5 शब्दसीमा 100-150

उत्तर :— लाभदायक गतिविधियाँ (Useful activi-ties)- बैंक्टीरिया अत्यंत महत्वपूर्ण सूक्ष्मजीव हैं। ये वातावरण के नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके मृदा की उर्वरता को बढ़ाते हैं, डेयरी उद्योग में दही बनाने के काम आते हैं तथा अनेक प्रमुख प्रतिजैविक भी इन्हीं से मिलते हैं। बैक्टीरिया द्वारा मनुष्य को पहुँचने बाले लाभों की सूची नीचे के दी गई है- 1. नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen Fixation) कुछ बैंक्टीरिया वायुमण्डल में स्थित आण्विक नाइट्रोजन को नाइट्रोजन के यौगिक में बदल देते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं- (a) स्वतंत्र रूप से रहने वाले (Free Living) – मृदा में नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करने वाले, जैसे- एजोटोबैक्टर, क्लॉस्ट्रीडियम आदि। (b) सहजीवी (Symbiotic) – लेग्यूमिनोसी कुल के पौधों की जड़ों की ग्रंथिकाओं में सहजीवन करने वाले, जैसे- राइजोबियम, लेग्यूमिनोसेरम। 2. नाइट्रीकरण जीवाणु (Nitrifying Bacteria) – ये दो प्रकार के होते हैं- (a) अमोनिया को नाइट्राइट (NO,) में वदल देने वाले जैसे- नाइट्रोसोमोनास। (b) अमोनिया को नाइट्रेट (NO में बदल देने वाले, जैसे- नाइट्रोबैक्टर। 3. अमोनीकरण (Ammonification)- ये बैक्टीरिया, प्रोटीन तथा कुछ अन्य जटिल पदार्थों को अमोनिया में बदल देते हैं, जैसे- बैसिलस माइकॉइडिस। 4. खाद्य शरृंखला में (In Food Chains)- कुछ बैंक्टीरिया, पौधे तथा जन्तुओं के मृत शरीर पर वृद्धि करते हैं। और इन जटिल कार्बनिक पदार्थों को सरल अकार्बनिक पदार्थों में बदल देते हैं। इस कारण मृदा में पौधों के लिए उपयोगी पोषक तत्व संचयित होते हैं। पौधे इन सरल अकार्बनिक तत्वों का अवशोषण करते हैं। 5. डेवरी उद्योग में (In Dairy)- बैक्टीरिया, दूध में उपस्थित लैक्टोस (Lactose) शकरा को लैक्टिक अम्ल में बदल देते हैं। इस कारण दूध खट्टा हो जाता है। इस प्रकार की किण्वन क्रिया वाले मुख्य बैक्टीरिया हैं- ट्रेपटेकॉकस लैक्टिस, लैक्टोबैसिलस कैसिआई, लै. एसिडोफिलस इत्यादि। 6. अन्य उद्योगों में (In Other Industries)- अनेक महत्वपूर्ण पदार्थों का निर्माण विभिन्न बैक्टीरिया की सहायता से किया जाता है। सिरका, लैंक्टिक, अम्ल, लाइसीन, एसीटोन-ब्यूटेनॉल निर्माण में तथा तन्तुओं को सड़ाने व तम्बाकू एवं चाय उद्योग में बैंक्टीरिया का विशेष महत्व है। 7. मानव के आंत्र में सहजीवन (Symbiosis in Iuman Intestine)- मानव तथा अनेक कशेरुको प्राणियों के आंत्र में इश्चिरिचिया कोलाई (Escherichia coli) पाया जाता है। यह बैंक्टीरिया सामान्यत: हानिकारक नहीं होता और पाचन क्रियाओं में सहायक होता है। 8. रोमन्थी प्राणियों में (In Ruminate Animals)-इन प्राणियों के रूमेन (numen) प्रथम आमाशय में सेल्युलोज के पाचन के काम करने वाले बैक्टीरिया, जैसे- रुमिनोकॉकस एल्बस इत्यादि पाये जाते हैं प्राणी मुख्यत: घास चरते हैं परन्तु घास के सेल्युलोज को केवल उनके रूमेन में पाये जाने वाले बैक्टीरिया ही अपघटित कर सकते हैं। 9. प्रतिजैविक अथवा एण्टीबायोटिक (Antibiot ics)- ये जीवधारियों के उपापचयी व्युत्पन्न होता है। किसी अन्य सूक्ष्म बैंक्टीरिया के लिए हानिकारक अथवा निरोधी (inhibitory) होते हैं। प्रतिजैविक प्रतियोगिता निरोध (competition inhibition) द्वारा रोगों को ठीक करते हैं। अधिकतर प्रतिजैविक, बैक्टीरिया से ही प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 6.पुनर्योरज डी.एन.ए. तकनीक क्या है? पुनर्योरज डी.एन.ए. तकनीकी प्रक्रिया का सविस्तार वर्णन कीजिये। अंक 3 शब्दसीमा 50-75

उत्तर :— उत्तर- DNA पुनर्योगज तकनीक- कृत्रिम विधियों द्वारा नियंत्रित वातावरण में किसी भी सजीव के मूल DNA या सजीव के आण्विक संगठन में परिवर्तन करने की विधियों एवं प्रक्रियाओं को पुनर्योगज DNA तकनीक कहते हैं तथा इस प्रकार निर्मित DNA को पुनर्योगज DNA कहते हैं।

सामान्यतया पुनर्योगज DNA अणु का निर्माण दो या दो से अधि कि पूर्णतया भिन्न DND अणुओं को आपस में जोड़कर किया जाता है।

पुनर्योगज DNA तकनीकी के चरण- पुनर्योगज DNA तकनीक का विस्तृत अध्ययन करने के लिए इसे निम्न चार चरणों में बॉटा जा सकता है

(1) लक्ष्य (इच्छित) DNA का चयन, शोधन एवं पृथक्करण- एक प्रारूपिक DNA अणु में न्यूक्लियोटाइडो के अनुक्रम पाये जाते हैं जो अनेक प्रकार के प्रोटीनों को कोड़ित करने का कार्य करते हैं।

(2) इच्छित जीनों को वेक्टरों से जोड़ना- इस प्रक्रिया में Rएन्जाइम द्वारा विलगित या काटे गये DNA खण्ड बहुत अधिक संख्या में निर्मित होते हैं। इनमें से कुछ जीनों में लक्षणों के माध्यम से अपने आप को अभिव्यक्त करने की क्षमता होती है, इसके विपरीत कुछ जीन या DNA खण्ड स्वयं को अभिव्यक्त करने में असक्षम होते हैं।

(3) जीवाणु कोशिका में वाहकों (प्लाज्मिड्स) की स्थापना तथा दाता DNA का गुणन या क्लोनिंग- सकुंचन एन्जाइमों द्वारा काटे गये पृथक्कित दाता DNA के इच्छित जीनों को पुनर्योगज प्लाज्मिड्स (Recombinant plasmids) के रूप में जीवाणु कोशिका में प्रवेश करवाया जाता है।

(4) उपयोगी या इच्छित क्लोन्ड जीनों की पहचान एवं इनका अन्य सजीवों में स्थानान्तरण- इस प्रकार क्लोनिंग द्वारा प्राप्त अनेक जीन प्रतिलिपियों में से इच्छित या उपयोगी जीनों की पहले पहचान की जाती है तथा भली-भाँति पहचान स्थापित हो जाने के बाद इनका बहुगुणन पुनः उपयुक्त माध्यम पर करवाया जाता है।

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